जेलों के भीतर बहुसंख्यक बनते मुसलमान

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लेख: रुखसार वसीम

प्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक जे. एस. मिल का ये कथन बेहद लोकप्रिय है की ” बहुमत की तानाशाही में अल्पसंख्यकों की स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है” ये कथन भारतीय मुसलमानों पर बेहद सटीक बैठता है क्योंकि भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में सरकारी सेवाओं, संसद और विधानसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व भले ही काफी कम
हो पर जेलों  में वे अपनी आबादी से लगभग दोगुने हैं .

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की जानिब से राज्यसभा में पेश किये गए हालिया डेटा के अनुसार देश की विभिन जेलों में बंद बेगुनाह मुस्लिम क़ैदियों की वर्ष 2015 तक कुल तादाद 81,306 है. डेटा के मुताबिक़ मुस्लिम क़ैदियों का कुल फीसद 15.8% है, जबकि अंडरट्रायल कैदियों का प्रतिशत 20.9% है. यानि मुसलमानों की कुल आबादी के लिहाज़ से क़ैदियों की ये संख्या किसी दुसरे समुदाय के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है.

न्याय-व्यवस्था व जेल-व्यवस्था उन लोगो के लिए ही अनुदार है जो ऐसे वर्ग से आते हैं जिनका शोषण करना आसान होता है. हर क्षेत्र में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम होने के साथ – साथ इस सम्प्रदाय में एक परिपक्व लोक समाज का भी अभाव है इसलिए एक ऐसे सशक्त दबाव समूह का सवाल ही पैदा नहीं होता जो इनके साथ हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज़ उठा सके. इसलिए भारतीय मुसलमानों में अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने की ताकत ही नहीं होती , वे कानून के आसान शिकार होते हैं. यह आए दिन सुनने में आता है की अमुक व्यक्ति आतंकवाद के आरोप में दस साल या उससे अधिक साल जेल में रहा और उसे अदालत ने ‘बाइज़्ज़त बरी’ कर दिया. इन फैसलों पर इस कोण से कोई विचार करने वाला नहीं होता कि बीते दस सालों में उस बंदी ने जो बदनामी , तंगहाली , मुफलिसी व शोषण सहा है , उसकी भरपाई किसी अदालत के फैसले से नहीं हो सकती. जेल से निकलने वाले को समाज भी तिरस्कार की नज़र से देखता है.muslims-generic-759

इसका सबसे बड़ा उदाहरण इरशाद अली हैं जिनको पुलिस ने शक के आधार पर पकड़ा और प्रताड़ित किया और जब उनको पता लग गया के ये निर्दोष हैं तो उनको इस बात के  लिए ज़बरदस्ती तैयार किया गया के वो भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी IB के लिए कार्य करे उन्होंने ये बात स्वीकार कर ली. इसके लिए उनको 7,000 रूपये महीने की तनख्वाह भी मिलती थी लेकिन जब उन्होंने उनके लिए काम करना बंद कर दिया तो उनके ऊपर आतंकवादी होने के आरोप लगाया गया और 29 वर्ष की आयु में उन्हें जैल में डाल दिया गया. वह कहतें हैं की आपको दुनिया की नज़र में अपराधी बनाने का कार्य 10 फीसद पुलिस करती है बाकी 90 फीसद हाथ मीडिया का होता है. वह 4 वर्ष तक जैल में रहे और 11 साल तक इन्साफ की लड़ाई लड़ी और 22 दिसम्बर 2016 को वो निर्दोष साबित हुए और बाइज़्ज़त बरी कर दिए गए. वह कहतें है की जो मैने और मैरे परिवार ने मुश्किलें उठाई हैं उसकी भरपाई नहीं हो सकती है और जिन पुलिस वालों ने मुझे प्रताड़ित किया उन पर भी कोइ कार्यवाही नहीं हुई है.

एक अन्य उदाहरण मध्य प्रदेश के खंडवा निवासी अब्दुल वकील का है कई मामलों में शिक्षित मुस्लिम युवा सिर्फ अपने समुदाय की वजह से पुलिसिया ज़ुल्म के शिकार हो जाते है। मध्य प्रदेश के खंडवा के 68 वर्षीय अब्दुल वक़ील खुद के परिवार को सिमी के नाम पर प्रताड़ित मानते हैं. उनके छोटे बेटे मोहम्मद अज़हर को सिमी का आतंकी बता कर महाराष्ट्र पुलिस ने औरंगाबाद में 26 मार्च 2012 को एनकाउंटर में मार डाला। इस परिवार को नहीं मालूम के बेटे अज़हर का अपराध क्या था.

अब सवाल ये है कि इस समस्या का हल कैसे निकाला जाये। सच्चर कमेटी रिपोर्ट ने वामपंथियों की सबसे ज़्यादा किरकिरी कराई थी. मुसलमानों का हितैषी का दम्भ भरने वाली पार्टियां भी सत्ता में पहुँचने के बाद कुछ नहीं कर पा रही हैं. उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने चुनाव से पहले ये दावा किया था की गलत इलज़ाम में फंसाकर डाले गए मुस्लिम युवाओं को जेल से रिहा कर दिया जायेगा। अब उसके 5 साल पूरे हो गए है और चुनाव फिर से हो रहे हैं लेकिन पीड़ित मुसलमानों को इंसाफ नहीं मिला चाहे वो हाशिमपुरा सामूहिक हत्याकांड हो या जेलों में बंद मुसलमान.

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अब परिपक्व शिक्षित मुस्लिम युवाओं को समझना होगा की वो एक ऐसे सशक्त लोक समाज का गठन करें जो शोषित और प्रताड़ित वर्गों की आवाज़ बन सकें. सोशल मीडिया पर एक बहुत बड़ा तबका दिखाई देता है जो मुसलमानों के हितों की आवाज़ उठाता है लेकिन ये आवाज़ तब उठती है जब बहुत देर हो चुकी होती है. उदाहरण के लिए भोपाल में जिन मुसलिम विचाराधीन कैदियों को सिमी का आतंकी बताकर  एनकाउंटर किया गया वो प्रथम दृष्टि में ही  फर्जी लगता
है लेकिन मुस्लिम समाज ने एनकाउंटर होने से पहले कभी उनके बारे में जानना नहीं चाहा. आवाज़ तब उठाई जब वो मर चुके हैं. अब जो जज न्यायमूर्ति पांडे इस जैल कांड की जाँच कर रहे थे उन्होंने इस शनिवार को ये कहते हुए इस्तीफा दे दिया की सरकार जाँच के लिए सुविधाएं मुहैया नहीं करा रही है.

हमने इस पर कहीं भी किसी को चर्चा करते हुए नहीं देखा. सिवाए कुछ जज़्बाती नारों के. कुछ दिन लोगों ने दिखावटी आँसू बहाये अब सब खामोश हैं. सवाल ये है कि यदि ये एनकाउंटर फर्जी था और वो मुसलमान विचाराधीन कैदी निर्दोष थे तो क्या उन पुलिस वालों पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए जिन्होंने एनकाउंटर किया? हमारी न्यायपालिका में अभी भी उम्मीद की हज़ारों किरणें मौजूद हैं. ज़ुल्म का अंधेरा तो तब ही छटेगा जब हम अपने अधिकारों की आवाज़ उठाएंगे,उन अधिकारों की आवाज़ जिनमें सामाजिक और आर्थिक न्याय को तमाम अधिकारों का शीर्षक कहा जा सकता है.

admin

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